मंगलवार, 2 अप्रैल 2013

अर्थ रोटी और उसका भार




खुली आखों से दिखी
नटराज की प्रतिमा
विस्तीर्ण पथ पर
जिसकी आखों की गहराई से निकलता आकार
ढोलक की थाप पर समय जाता हार
जिसके हृद क्रोड़ मे नहीं प्रतिकार

नेत्रो कि भंगिमा और उसका प्रहार
शहस्त्र वीणा पर अर्थ की चित्कार
सुनाई पड़ता हर कही
पत्तों की खड्खड़ाहट पर
सिकती रोटी का राज
मै हम अहम का विस्तार यहा नहीं

सरपट घूमते चक्के पर
सर्जना का आकार
है यहा पर एक चित्कार
अर्थ रोटी और उसका भार !!!

3 टिप्‍पणियां:

  1. kya chal raha h, khub rotiyan bnai ja rahi h, chunnu-munnu ke liye

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  2. kitni rotiya bna rahi ho, chunnu ke liye do, munnu ke liye do, unke pa ke liye char, apne liye bhi bna lo, kya ese hi rahogi, sabko dekhkr

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  3. mamsab, aapke purse me aajkal kavita ki notebook ki jagah, munnu ke dieper aur nepkin rahte h, ynhi mile h, aapki tlashi me, aur iska bhi apna aanand h, stri ke jivan ki ganga ynhi se hokr bahti h, jise samarpan kahte h, ghar-grasthi ke liye, vrna ladki akeli jivan kaise nikale

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